हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आगा सैयद बाक़िर हुसैनी ने मरकज़ी जामा मस्जिद स्कर्दू में हफ़्तावार तरबियती नशिस्त से ख़िताब करते हुए अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के फ़रमानात की रौशनी में इल्म के निचोड़ को इबादत-ए-इलाही बताया।
नायब इमाम-ए-जुम्आ व जमाअत, मरकज़ी जामेअ मस्जिद स्कर्दू, आगा सैयद बाक़िर हुसैनी ने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) के इस मशहूर क़ौल का हवाला देते हुए कहा,
ख़ुलासा-ए-इल्म चार कलिमात हैं,अपने रब को पहचानना अपने आप को पहचानना, अपने हक़ूक़ को जानना और अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना
नहजुल बलाग़ा, हिकमत 147 के मफ़हूम के मुताबिक़) यानी तमाम उलूम का निचोड़ यही है।
अल्लामा आगा बाक़िर हुसैनी ने कहा कि अगर अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) के इस फ़रमान को क़ुरआन की रौशनी में समझा जाए तो इसका निचोड़ इस आयत में मिलता है:
﴿وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ﴾ (सूरह ज़ारियात, आयत 56)
यानी अल्लाह ने जिन्न-ओ-इंस को सिर्फ़ अपनी इबादत के लिए पैदा किया है। यही इल्म का हासिल, यही ज़िंदगी का मक़सद और यही इंसान की असल पहचान है।
उन्होंने कहा कि ख़ानदानी तकब्बुर, नस्ली ग़ुरूर, रंग-ओ-नस्ल का फ़र्क़, बड़ा-छोटा या ताक़तवर-कमज़ोर होना कोई मिय़ार-ए-फ़ज़ीलत नहीं; ये सब महज़ पहचान के लिए हैं। इज़्ज़त ओ शराफ़त का वाहिद मिय़ार तक़वा है, जैसा कि क़ुरआन फ़रमाता है:
﴿إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ﴾
(सूरह हुजरात, आयत 13)
यानी अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वही है जो सबसे ज़्यादा मुत्तक़ी हो।
आगा सैयद बाक़िर हुसैनी ने कहा कि जितना इंसान का अमल और तक़वा बढ़ता है, उतना ही वह ख़ुदा के क़रीब होता जाता है। मगर अफ़सोस कि इंसान अपनी महदूद अक़्ल और कमज़ोर शऊर के बावजूद दावा करता है कि ये दौलत मैंने कमाई, ये घर मैंने बनाया, ये तालीम मेरी मेहनत का नतीजा है, ये कारोबार मेरा कमाल है।हालाँकि हक़ीक़त यह है कि ये सब ख़ुदावंद-ए-मुतआल की अता है और इंसान महज़ एक अमानतदार है।
उन्होंने कहा कि इंसान के जिस्म का सबसे मुअज़्ज़ज़ मक़ाम उसकी पेशानी है, और हम सज्दे में उसी पेशानी को ज़मीन पर इसलिए रखते हैं ताकि याद रहे कि वह ज़ात अज़ीम है और हम सरापा मोहताज हैं। सज्दा इंसान के ग़ुरूर को तोड़ता है और उसे उसकी हक़ीक़त दिखाता है।
अब्द वही है जो अपनी नफ़ी में ख़ुदा को पहचान ले, और मअबूद वही है जो बंदे को उसकी असल हैसियत समझा दे। जब अब्द झुकता है तो बुलंद होता है, और जब मअबूद को मान लेता है तो सब कुछ पा लेता है। तमाम इल्म का निचोड़ यही है कि ख़ुदा की इबादत की जाए।
आख़िर में आगा सैयद बाक़िर हुसैनी ने निहायत दर्दमंदाना अंदाज़ में कहा कि बंदा गुनाह इस हिसाब से करे कि उसके अज़ाब को बर्दाश्त भी कर सके। इंसान इतना नाज़ुक है कि दुनिया की मामूली बीमारी और थोड़ी-सी तकलीफ़ भी सहन नहीं कर पाता जो दुनिया की मुख़्तसर आज़माइश है तो क़यामत के दाइमी और दर्दनाक अज़ाब को कैसे सहेगा?
इसलिए चंद लम्हों की दुनियावी लज़्ज़त के लिए हमेशा की आसाइशों वाली जन्नत को ज़ाया मत कीजिए। ये दुनिया फ़ानी है, मगर आख़िरत हमेशा बाक़ी रहने वाली है। अक़्लमंदी यही है कि आरज़ी ख़्वाहिशात पर दाइमी कामयाबी को क़ुर्बान न किया जाए।
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